सांस्कृतिक विरासत, सभ्यता के सहारे तेलंगाना के भविष्य की नींव रखते “मामिदी” !

फोटो: “हरिकृष्णा मामिदी”, निदेशक, सांकृतिक एवं भाषा विभाग, तेलंगाना सरकार

ग्रामीण पर्यटन भले ही टूरिज्म सेक्टर की एक शाखा भर मालूम देता हो, लेकिन इसके फायदों को यदि बारीकी से समझा जाये, तो इसका असर कहीं ज्यादा व्यापक और गहरा होता है।  ग्रामीण पर्यटन का फलक हिल स्टेशनों और धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व के केन्द्रों के पर्यटन से कहीं ज्यादा जटिल, प्रभावकारी और व्यापक है। जिसे एक कवि, लेखक औऱ फिल्मकार ही उस व्यापकता को सरलता में बदल कर आम लोगों तक पहुंचा सकता है। और इस काम को तेलंगाना राज्य के सांकृतिक एवं भाषा विभाग के निदेशक “हरिकृष्णा मामिदी” बखूबी अंजाम दे रहे हैं।

वैसे तो ग्रामीण पर्यटन गाँव के लोगों को बाहरी दुनिया से जोड़ने का एक बहुत ही सरल और सशक्त माध्यम माना जाता है। जब शहरी और विदेशी पर्यटक गाँवों में आते हैं, तब वे अपने साथ अलग-अलग सभ्यताओं, संस्कृतियों, सोच और नजरियों की छाप भी लेकर आते हैं। इनसे सम्पर्क में आने के कारण न केवल ग्रामीणों का सामाजिक-सांस्कृतिक दायरा फैलता है, बल्कि पर्यटक भी उस स्थान की लोकभाषा, लोक संस्कृति, रहन-सहन और सोच का प्रभाव अपने साथ लेकर लौटते हैं। किसी देश या राज्य की सांस्कृतिक विरासत को फैलाने के लिये ग्रामीण पर्यटन से बेहतर कोई माध्यम नहीं हो सकता। इसका जीता जागता उदाहरण हमें तेलंगाणा राज्य में मिला, जहां महिलाओं ने 9 दिनों तक चलने वाला फुलों का त्योहार “बटुकम्मा” पूरे जोश के साथ मनाया और इस महोत्सव को दुनिया के कोने-कोने में फैलाने का काम “हरिकृष्णा मामिदी” ने बखूबी किया।

“हरिकृष्णा मामिदी” पिछले 22 साल ले राज्य सरकार के साथ जुड़ कर अपने राज्य की संस्कृति, भाषा और साहित्य को दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं। हाल ही में मनाया गया “बटुकम्मा” महोत्सव में भारत के दूसरे राज्यों से आए पर्यटकों के अलावा, कई अफ्रीकी देशों से पर्यटक भी शामिल हुए थे। मामिदी, तेलंगाना राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया में फैलाने के लिए कई तकनीक का भी इस्तेमाल करते हैं। किताबें लिखने से लेकर फिल्में बनाकर सोशलमिडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना हरिकृष्णा मामिदी की दिनचार्या में शामिल है। बतौर फिल्म इतिहासकार मामिदी ने पिछले दो दशक में तेलंगाना राज्य की सांस्कृतिक इतिहास पर कई डॉक्यूमेंट्री और लघु फिल्में भी बनाईं।

मालूम हो कि तेलंगाना में लगभग 5,000 वर्षों का सांस्कृतिक इतिहास है।  । हिन्दू काकातिया वंश और मुस्लिम कुतुब शाही और आसफ़ जाही राजवंश (जिसे हैदराबाद के निज़ाम भी कहा जाता है) के शासन के दौरान यह क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप में संस्कृति का सबसे प्रमुख केंद्र के रूप में रहे हैं। शासकों के संरक्षण और कला और संस्कृति के लिए रुचि ने तेलंगाना को एक अद्वितीय बहु-सांस्कृतिक क्षेत्र में बदल दिया जहां दो अलग-अलग संस्कृतियां एक साथ मिलती हैं।

इसके अलावा तेलंगाना राज्य लंबे समय से विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के लिए एक बैठक स्थान भी रहा है। इसे “दक्षिण के दक्षिण और दक्षिण के उत्तर” के रूप में जाना जाता है।  यह अपने गंगा-जमुना तहसीब के लिए भी जाना जाता है और राजधानी हैदराबाद को लघु भारत के रूप में जाना जाता है, जिसका चित्रण और वर्णन लेखक और फिल्मकार “हरिकृष्णा मामिदी” ने कई बार अपनी फिल्मों और किताबों में भी किया है।

5 हजार वर्षों का सांस्कृतिक इतिहास वाले राज्य तेलंगाना में लगभग 76% आबादी तेलुगू बोलती है, 12% उर्दू बोलती है, और 12% अन्य भाषाएं बोलती हैं।  । सन 1948 के बाद, हैदराबाद राज्य भारत के नए गणराज्य में शामिल हो जाने के बाद, तेलुगु सरकार की भाषा बन गया, और तेलुगू स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा के माध्यम के रूप में पेश किया गया था, जिससे राज्य में तेलगू  ज्यादातर लोगों की पहली भाषा बन गई।

हालांकि, “हरिकृष्णा मामिदी” का मानना है कि तेलंगाना के ऐतिहासिक धरोहर को हर घर और हर युवा तक पहुंचाने के लिए तेलगू के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल करना जरूरी है। अन्यथा, भविष्य में तेलंगाना राज्य की सांस्कृतिक धरोहर सिर्फ राज्य में हीं सिमट कर रह जाएगी।

फिलहाल भारत के ऐतिहासिक महत्व के कुल 32 स्थल, विश्व विरासत स्थल सूची में दर्ज हैं। इनमें 25 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक श्रेणी में शामिल हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए और मानवता के हित के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का हित भी इसी में है कि वे इनका संरक्षण करें।

 

                                                                                                                                               -डा. म. शाहिद सिद्दीकी

Follow via Twitter @shahidsiddiqui

इसे शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *